एक अहम आदेश में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश की पूरी एडमिनिस्ट्रेटिव मशीनरी को यह पक्का करने का निर्देश दिया कि राज्य में जो लोग ईसाई बन गए, वे अनुसूचित जातियों (एससी) के लिए बने फ़ायदे लेना जारी न रखें।
यह देखते हुए कि धर्म बदलने के बाद एससी स्टेटस बनाए रखना “संविधान के साथ धोखाधड़ी” है, कोर्ट ने राज्य के सभी डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट के लिए ऐसी घटनाओं की पहचान करने और उन्हें रोकने के लिए कानून के अनुसार काम करने के लिए चार महीने की सख्त डेडलाइन तय की।
यह निर्देश जस्टिस प्रवीण कुमार गिरी की बेंच ने जितेंद्र साहनी नाम के एक व्यक्ति की अर्जी को खारिज करते हुए दिए, जिस पर हिंदू देवी-देवताओं का मज़ाक उड़ाने और दुश्मनी को बढ़ावा देने का आरोप है।
लाइव लॉ क अनुसार बेंच साहनी द्वारा दायर एक रद्द करने की याचिका पर विचार कर रही थी, जो उनके खिलाफ आईपीसी की धारा 153-अ और 295-अ के तहत जारी आरोपपत्र से संबंधित थी।
आवेदक के वकील ने तर्क दिया कि साहनी ने सिर्फ़ अपनी ज़मीन पर “यीशु मसीह के वचनों” का प्रचार करने की इजाज़त मांगी थी। उन्हें झूठा फंसाया जा रहा है, जबकि राज्य की दलील में उनके धर्म के बारे में साफ़ विरोधाभास बताया गया।
कोर्ट ने कहा कि साहनी ने अपनी अर्ज़ी के समर्थन में दाखिल किए गए हलफ़नामे में अपना धर्म ‘हिंदू’ बताया था, लेकिन पुलिस जांच में इसके उलट तस्वीर सामने आई। असल में अतिरिक्त सरकारी वकील ने अदालत का ध्यान सीआरपीसी की धारा 161 के तहत दर्ज एक गवाह के बयान की ओर दिलाया, जिसने गवाही दी थी कि साहनी, जो मूल रूप से केवट समुदाय से थे, ने ईसाई धर्म अपना लिया और ‘पादरी’ (पुजारी) के तौर पर काम कर रहे थे।
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि गरीब लोगों को लालच देकर वह हिंदू धर्म के लोगों को ईसाई बनाना चाहते हैं।
इस बात को गंभीरता से लेते हुए हाईकोर्ट ने आदेश में गवाह के बयान को दोहराया, जिसमें साहनी पर गांववालों को इकट्ठा करने और धर्म बदलने के लिए हिंदू देवी-देवताओं के बारे में गंदी, गाली-गलौज वाली और बेतुकी भाषा का इस्तेमाल करने का आरोप लगाया गया।
गवाह ने आगे आरोप लगाया कि साहनी ने हिंदू मान्यताओं का मज़ाक उड़ाया, गांववालों से कहा: “आप लोग सदियों से हिंदू धर्म को मानते आ रहे हैं…इसमें हज़ारों देवी-देवता हैं; किसी के आठ हाथ हैं, किसी के चार, किसी के चेहरे पर सूंड है…कोई चूहे की सवारी करता है, कोई मोर की…कोई भांग पीता है, कोई गांजा पीता है”।
गवाह ने आगे आरोप लगाया कि साहनी ने यह कहकर हिंदू धर्म का मज़ाक उड़ाया कि जाति के भेदभाव की वजह से इसमें कोई इज़्ज़त नहीं मिलती, जबकि ईसाई धर्म अपनाने से नौकरियां मिलेंगी, बिज़नेस बढ़ेगा और ‘मिशनरी’ से पैसे का फ़ायदा होगा।
कॉन्स्टिट्यूशन (शेड्यूल्ड कास्ट) ऑर्डर, 1950 के मुताबिक धर्म बदलने वालों के कानूनी दर्जे को ध्यान में रखते हुए जस्टिस गिरी ने कहा कि ऑर्डर के पैराग्राफ 3 के तहत, कोई भी व्यक्ति जो हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म से अलग धर्म मानता है, उसे शेड्यूल्ड कास्ट का सदस्य नहीं माना जा सकता।
कोर्ट ने सी. सेल्वरानी बनाम स्पेशल सेक्रेटरी-कम-डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर 2024 में सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले पर भरोसा किया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि ईसाई धर्म अपनाने पर कोई भी व्यक्ति अपनी मूल जाति का नहीं रहता है।
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने साफ तौर पर कहा था कि सिर्फ फायदे लेने के मकसद से धर्म बदलना संविधान के साथ धोखा है और आरक्षण नीति के सिद्धांतों के खिलाफ है।
इसके अलावा, हाईकोर्ट ने आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के 2025 के अक्कला रामी रेड्डी बनाम स्टेट ऑफ़ एपी मामले में दिए गए फैसले का भी जिक्र किया, जिसमें यह फैसला सुनाया गया कि कोई व्यक्ति, जिसने ईसाई धर्म अपना लिया है और सक्रिय रूप से उसे मानता है, वह शेड्यूल्ड कास्ट कम्युनिटी का सदस्य नहीं रह सकता है। इसलिए उसे शेड्यूल्ड कास्ट, शेड्यूल्ड ट्राइब (प्रिवेंशन ऑफ़ एट्रोसिटीज़) एक्ट के नियमों का इस्तेमाल करने से रोक दिया गया।
इसलिए मौजूदा केस से आगे बढ़ते हुए जस्टिस गिरी ने नौकरशाही के सबसे ऊंचे स्तर को कानून को ‘सही मायने’ में लागू करने के लिए निर्देश जारी किए।
अदालत ने ने कैबिनेट सचिव (भारत सरकार) और मुख्य सचिव (उत्तर प्रदेश सरकार) को अनुसूचित जातियों के मामले और कानून के नियमों को देखने का निर्देश दिया। इसके अलावा, अल्पसंख्यक कल्याण विभाग के प्रधान सचिव को यह पक्का करने के लिए सही कार्रवाई करने का निर्देश दिया गया कि अल्पसंख्यक दर्जे और अनुसूचित जाति दर्जे के बीच का अंतर सख्ती से लागू हो।
सबसे ज़रूरी बात यह है कि कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के सभी डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट को चार महीने के अंदर कानून के मुताबिक काम करने का निर्देश दिया। उन्हें अपने कामों के बारे में मुख्य सचिव को बताने का निर्देश दिया गया ताकि यह पक्का हो सके कि सुप्रीम कोर्ट के कहे अनुसार, “संविधान के साथ धोखाधड़ी” उनके इलाकों में न हो।
आवेदक (साहनी) के मामले में अदालत ने उनके गुमराह करने वाले हलफनामे को गंभीरता से लिया और महाराजगंज के डीएम को तीन महीने के अंदर उनके धर्म की जांच करने का निर्देश दिया। अदालत ने आदेश दिया कि अगर साहनी जालसाजी के दोषी पाए जाते हैं, जिसमें उन्होंने ईसाई पादरी होते हुए भी अदालत के कागज़ात में हिंदू होने का दावा किया तो उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए ताकि भविष्य में कोर्ट में ऐसे हलफनामे दाखिल न हों।
उच्च न्यायालय ने साहनी की अर्जी भी खारिज कर दी। हालांकि, उन्होंने ट्रायल कोर्ट में डिस्चार्ज अर्जी दाखिल करने का रास्ता खुला रखा, जिसमें उन्होंने अपनी सभी शिकायतें बताईं, जिसमें यह दलील भी शामिल है कि एफआईआर और जांच के दौरान इकट्ठा की गई सामग्री में आईपीसी की धारा 153-अ और धारा 295A-अ के तत्व गायब हैं।